शिक्षक : विश्व के सबसे आदर्श मानव जीवन
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
महान कवि कबीरदास द्वारा रचित इस काव्य का अर्थ है कि यदि आपके सामने गुरु और गोविंद दोनों खड़े हो तो आप सर्वप्रथम किनके पैर छुएँगे ? सबसे पहले गुरु के पैर छूना उत्तम होगा। क्योंकि वे गुरु ही हैं जिन्होंने हमें गोविंद रूप का दर्शन करवाया। वे गुरु ही हैं जिन्होंने यह बताया कि ये ईश्वर हैं।
हम अपने बोलचाल कि भाषा में ‘गुरु’ और ‘शिक्षक’ शब्द का प्रयोग हमेशा से करते आए हैं। परंतु कुछ ही ऐसे हैं जो इन शब्दों के वास्तविक अर्थ को समझ पाए हैं। इन दोनों शब्दों (‘गुरु’ और ‘शिक्षक’) का अर्थ एक ही है : जो हमें शिक्षा देते हो। जरूरी नहीं कि विद्यालय में जो पुस्तक की ज्ञान को विस्तृत और सरल रूप से बताते हैं वो ही गुरु हैं। ‘गुरु’ शब्द का श्रेय उन सभी लोगों को जाता है जो हमें कुछ अच्छा सीखते हैं, जो हमें अच्छी शिक्षा देते हैं। हमारे माता पिता ही हमारे सर्वप्रथम शिक्षक हैं। हमारे माता पिता ही हैं जिन्होंने हमें जीना सिखाया।
हमारे देश भारत में सदियों से ही शिक्षकों के सम्मान में ‘गुरु पूर्णिमा’ मनाया जा रहा है एवं अंग्रेजी त्योहारों में भी ‘शिक्षक दिवस’ को शामिल किया गया है। एक मनुष्य को जीवन में सफल होने के लिए शिक्षक की आवश्यकता होती ही होती है। शिक्षक वह हौसला है जिसके बिना परिंदा भी उड़ नहीं सकता। इसका प्रमाण हिन्दू धर्म में मान्यता प्राप्त श्रीमद्भागवत गीता से ही मिलता है। स्वयं भगवान नारायण विष्णु के अवतार श्रीराम को भी कुशल मनुष्य बनाने में उनके गुरु महर्षि विश्वामित्र का योगदान रहा। सबसे विद्वान राजा श्रीकृष्ण के गुरु संदीपनी थे। कुरुक्षेत्र में अर्जुन जैसे तेजस्वी धनुर्धर को भी शिक्षक की आवश्यकता पड़ी थी। वे शिक्षक श्रीकृष्ण थे। महाभारत में भी एक कथा है एकलव्य की। एकलव्य ने भी द्रोणाचार्य को गुरु मानकर उनकी प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या सीखा। अर्थात् किसी भी जीवन को सफल बनाने में गुरु की आवश्यकता होती है।
इसलिए कहा जाता है –
|| गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा
गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||
Nice👍😊
ReplyDeleteGlad to see that you've visited my blog.
DeleteWow are
ReplyDeleteThank you for your response. Share it!
DeleteOm Namah Shivay.